मां की गोद, पिता का आश्रय, मेरा मध्यप्रदेश है।
सुख का दाता सबका साथी शुभ का संदेश है,
मां की गोद, पिता का आश्रय, मेरा मध्यप्रदेश है।
विंध्याचल-सा भाल नर्मदा का जल जिसके पास है,
यहां ज्ञान विज्ञान कला का लिखा गया इतिहास है।
उर्वर भूमि, सघन वन, रत्न, संपदा जहां अशेष है,
स्वर-सौरभ-सुषमा से मंडित मेरा मध्यप्रदेश है।
सुख का दाता सब का साथी शुभ का संदेश है,
मां की गोद, पिता का आश्रय, मेरा मध्यप्रदेश है।
चंबल की कल-कल से गुंजित कथा तान, बलिदान की,
खजुराहो में कथा कला की, चित्रकूट में राम की।
भीमबैठका आदिकला का पत्थर पर अभिषेक है,
अमृत कंुड अमरकंटक में, ऎसा मध्यप्रदेश है।
शिप्रा में अमृत घट छलका मिला कृष्ण को ज्ञान यहां,
महाकाल को तिलक लगाने मिला हमें वरदान यहां,
कविता न्याय, वीरता, गायन सब कुछ यहां विशेष है,
ह्वदय देश का यह, मैं इसका, मेरा मध्यप्रदेश है।
सुख का दाता सबका साथी शुभ का संदेश है,
मां की गोद, पिता का आश्रय, मेरा मध्यप्रदेश है।
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भारत माता की जय वंदे मातरम,जय हिंद
जय-जय भारतवर्ष हमारे, जय-जय हिंद, हमारे हिन्द,
विश्व-सरोवर के सौरभमय प्रिय अरविंद, हमारे हिन्द!
तेरे स्रोतों में अक्षय जल, खेतों में है अक्षय धान,
तन से, मन से, श्रम-विक्रम से, है समर्थ तेरी सन्तान!
सबके लिए अभय है जग में, जन-जग में तेरा उत्थान,
बैर किसी के लिए नहीं है, प्रीति सभी के लिए समान!
गंगा-यमुना के प्रवाह हैं अमल अनिंद्य, हमारे हिंद,
जय-जय भारतवर्ष हमारे, जय-जय हिंद, हमारे हिन्द!
तेरी चक्र पताका नभ में, ऊँची उड़े सदा स्वाधीन,
परंपरा अपने वीरों की शक्ति हमें दे नित्य नवीन।
सबका सुहित हमारा हित है, सार्वभौम हम सर्वजनीन,
अपनी इस आसिंधु धरा में नहीं रहेंगे होकर हीन!
ऊँचे और विनम्र सदा के हिमगिरि, विंध्य, हमारे हिंद,
जय-जय भारतवर्ष हमारे, जय-जय हिंद, हमारे हिन्द!
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गीत, सियारामशरण गुप्त
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गौरव कहता है:- जब मैं छोटा था-
जब मैं छोटा था, शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी..
मुझे याद है मेरे घर से “स्कूल” तक का वो रास्ता, क्या क्या नहीं था वहां, चाट के ठेले, जलेबी की दुकान, बर्फ के गोले, सब कुछ,
…..अब वहां “मोबाइल शॉप”, “विडियो पार्लर” हैं, फिर भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है…
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जब मैं छोटा था, शायद शामे बहुत लम्बी हुआ करती थी..
मैं हाथ में पतंग की डोर पकडे, घंटो उडा करता था, वो लम्बी “साइकिल रेस”, वो बचपन के खेल, वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है.
शायद वक्त सिमट रहा है..
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जब मैं छोटा था, शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुजूम बनाकर खलना, वो दोस्तों के घर का खाना, वो साथ रोना, अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है, जब भी “ट्रेफिक सिग्नल” पे मिलते हैं “हाई” करते हैं, और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,
होली, दिवाली, जन्मदिन , नए साल पर बस SMS आ जाते हैं
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं..
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जब मैं छोटा था, तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग, पोषम पा, कट थे केक, टिप्पी टीपी टाप.
अब इन्टरनेट, ऑफिस, हिल्म्स, से फुर्सत ही नहीं मिलती..
शायद ज़िन्दगी बदल रही है.
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जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है.. जो अक्सर कबरिस्तान के बाहर बोर्ड पर लिखा होता है.
“मंजिल तो यही थी, बस जिंदगी गुज़र गयी मेरी यहाँ आते आते “
.
जिंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है.
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने मैं ही हैं.
अब बच गए इस पल मैं..
तमन्नाओ से भरे इस जिंदगी मैं हम सिर्फ भाग रहे हैं..
इस जिंदगी को जियो न की काटो..
**”"GKS“”**
10 Reasons why I chose research
10 Reasons why I chose research as a carrier.
1. I hate sleeping
2. I have already enjoyed my life in childhood
3. I cannot live without tension
4. I wanted to have disturbed family life
5. I believed in Gita “ Karm Karo, fal ki icha mat karo”
6. I wanted to take revenge on myself
7. I want to miss my love
8. I wanted social boycott
9. I wanted to break up with my friends
10. I love to work on Sundays & holidays
“गौरव” मन करता है,
“बस एक बार वापस लौटने का मन करता है
आज हर वो दिन जीने को मन करता है.
कुछ बुरी बातें जो अब अच्छी लगती हैं
कुछ बातें जो कल की ही बातें लगती हैं.
वो क्लास्सेस जो कभी मिस की थी हमने,
अबकी बार अटेंड करने का मन करता है,
बस एक बार वापस लौटने का मन करता है.
कभी जाग जाग कर लगाईं जो,
उस दोपहर की क्लास में आखें बंद करने को मन करता है.
कभी याद आता है 1st इयर का डर,
तो कभी “शर्मा अंकल” का घर,
कभी याद आती है रेग्गिंग के टाइम दिखाई डेरिंग,
तो कभी दिल की बातों की शेरिंग,
कई बार रातों को सुनाई देता है “ओये साले सोनी”,
तो आज भी आँखों में बरस जाती है “अघ्याराम कालोनी”
तब तो बस हम थे और था “शर्माजी” का घर,
डर ना था सिनिअरो का, निकल आये थे हमारे पर,
जब-जब “गौरव” की राहों में आते है नए-नए मोड़,
तब-तब याद याद आती है “कृष्णा कालोनी रोड”,
कभी “यादव सर” का घर हमारा आशियाना था,
“हर्ष, बलराम & मेरा (गौरव)” आना-जाना था,
अगर “शर्मा अंकल” कि ‘गुफा’ जैसा घर बड़ा सयाना था,
तो दुर्गा नगर वाला “आंटी” का मकान भी कौन सा पुराना था.
“रुद्राक्ष” में बड़े मस्ती में दिन कटते थे,
तो फिर फायनल year एक्साम में पूरी रात रटते थे.
रात में उठकर रेलवे स्टेशन जाकर पोहे खाना,
तो आते वक़्त प्लेटफ़ॉर्म पर जोर जोर से गाने गाना,
“गौरव” का फिर से वो रात में पोहे खाने को मन करता है,
बस एक बार वापस लौटने का मन करता है
हमेशा बिना टिकट ट्रेन में सफ़र करना,
तो उस टी.सी. का हमें “डफर” कहना.
एक बार फिर से वही बिना टिकट सफ़र करने को मन करता है,
बस एक बार वापस लौटने का मन करता है.
आज भी जब आसमान में बादल छाते है,
तो याद आता है “SATI” के ग्राउंड में बारिश में भीगना,
रात भर अदरक की चाय पीते-पीते छीकना.
“गौरव” कहता है यार जब भी “साँची” की गलियाँ याद आती है,
मेरा दिल और मेरी आँखे भर आती है.
कभी साँची के बस स्टैंड पर क्रिकेट खेलना,
तो कभी “……सर” का लेक्चर झेलना,
दोस्तों के रूम की वो बातें याद आती है.
कॉलेज के पास “गगन की चाय” की याद आती है
एक्साम के पहले कहना के सुबह तक हो जायेगा,
सुबह कहना के “साला ये तो पढ़ा ही नहीं बे”
पेपर के पहले “आल दी बेस्ट”,
बाद में “घंटा गया टेस्ट”, “जो पढ़ा वो वेस्ट”.
एक्साम के टाइम पे वो हसी मजाक याद आती है,
तब की बेकार लगने वाली फोटोस चेहरे पे हँसी लाती है.
अपनी गलतियों पे तुझसे डाट खाना याद आता है.
और तुम्हारी गलती देखने का अब भी “मन” करता है,
वो बेचारा “दांगी” तो आज भी सबको “टन” करता है.
एक ऐसी सुबह उठने को “गौरव” मन करता है,
जहाँ हर “SATIAN” 24×7 फन और सिर्फ फन करता है.
बस एक बार वापस लौटने का मन करता है.
बस एक बार और वापस लौटने का मन करता है.”
गणतंत्र दिन पर भारत माता
रुके न तू, झुके न तू
सदा अमर रहे तू।
मुसीबतों चाहे हो हजार हजार हो पर तेरे अस्त्र करोड़ करोड़
एक्जूठ करके उन्हें तू
काल के इस पल को लांगे तू ।
कदम कदम बढाये जा तू॥
हे दुश्मन तेरे हर कही , भीतर भी बाहर भी
कुचले तू, रोंदे तू
पराजय उन्हें दिलाये तू ।
कदम कदम बढाये जा तू॥
हे तेरे हम दास, हा दीवाने हे हम तेरे
कुछ भी कर देंगे हम तेरे लिए, निश्चिंत रहे तू
बदला लेंगे हम हर तेरे दुश्मनों से, निश्चिंत रहे तू।
कदम कदम बढाये जा तू॥
लंबी थी तेरी राहें अब तक हा कठिन थी तेरी राहे
फिर भी अजय रही हे तू
और सदा अजय रहेगी तू।
कदम कदम बढाये जा तू॥
आज तेरे गणतंत्र दिन पर भारत माता, मेरी उनसे येही दुआ हे
कि भर दे वह हमारे बाहों में वह शक्ति, मन में ऐसा विश्वास भर दे वह
अटल रहे हम अपने कदमों में, और हमसे अटल बने माता तू।
कदम कदम बढाये जा तू॥
जय हिंद॥
हँसना और हँसाना सीखो
हर पल तुम मुस्काना सीखो
कली कली से फूल फूल से
खुशबू तुम महकाना सीखो
इस प्यारी सी धरती को
सूरज सा चमकाना सीखो
अपनी धरती के दुश्मन को
दुनिया से पार लगाना सीखो
हँसना और हँसाना सीखो
हर पल तुम मुस्काना सीखो
*Thanx to Rachna Dixit>http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_21.html?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+rachanakar+%28Rachanakar%29&utm_content=Yahoo!+Mail<*
My first post!
This is my first blog.
हिन्दी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाये…
मराठी- नवीन वर्षाची शुभेच्छा….
मलयालम- पुथुवत्सरा आशाम्साकाल…..
नेपाल- नवावर्ष को शुवकामना…
पंजाबी- नवे साल दी मुबारकान…
सिंधी- नवौ साल मुबारक होजे…
तमिल- एनिया पुथंडू नल्वाझ्थुक्कल…
तेलुगू- नूथाना संवत्सरा शुभकांक्षालु …
ऊरदू- नया साल मुबारक हो…
गुजराती- नूतन वर्षाभिनंदन…
कन्नड़- होसा वारुशधा शुभशयागालू…

